स्वामी दयानन्द जी पर निबंध, Essay on Swami Dayanand ji
उन्नीसवीं सदी में भारत में जो सामाजिक धार्मिक लहर चली
आर्य समाज का सबसे महत्वपूर्ण योगदान था। इस लहर के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती जी थे। उनकी तुलना आधुनिक भारत के महान निर्माता में की जाती है। भारत के राष्ट्र निर्माण का शायद ही कोई ऐसा पक्ष होगा जिसको उन्होंने ना छुआ हो। उनके द्वारा शुरु किए गए इस महान कार्य को
लाला लाजपत, भगत सिंह, मदनलाल ढींगरा, स्वामी श्रद्धानंद, परमानंद, महात्मा हंसराज, राम प्रसाद बिस्मिल, पंडित लेखराम आर्य,जैसे आर्य समाजी महान पुरुषों ने शिखर पर पहुंचाया।
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स्वामी दयानंद सरस्वती जी का जीवन
स्वामी दयानंद सरस्वती जी का जन्म
1824 ईसवी को
काठियावाड़(गुजरात ) के एक
टंकारा के स्थान पर हुआ। स्वामी दयानंद सरस्वती जी के बचपन का नाम
मूल शंकर था। उनका नाम मुलशंकर इसलिए पड़ा, क्योंकि उनका जन्म
मूल नक्षत्र में हुआ। उनके पिताजी का नाम श्री
अंबा शंकर तथा उनकी माता जी का नाम
अमृता बेन था। ब्राह्मण होने के कारण, उनके माता और पिता जी
हिंदू धर्म में कड़ी आस्था रखते थे। वह
शिव जी को बहुत मानते थे और उन्होंने
मूल शंकर को भी
शिव भक्त बनाने का प्रयास किया। परंतु एक घटना ने, उन्हें परमात्मा के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दिया।ब्राह्मण होने के कारण एक बार
शिवरात्रि के दिन उनका परिवार एक मंदिर में
शिवजी की पूजा कर रहे थे। स्वामी दयानंद जी यह सोच रहे थे के शिवजी आएंगे और
शिवलिंग पर चढ़ाएं प्रसाद का ग्रहण करेगे, उन्होंने देखा कि शिवलिंग पर चढ़ाएं प्रसाद को
चूहे खा रहे थे। इस घटना ने उन्हें परमात्मा के बारे बे सोचने के लिए विवश कर दिया, इसलिए वह
सत्य की खोज करने लगे। उन्होंने
वेदों को सर्वोपरि माना, और लोगों को वेदों की ओर जाने को कहा।उनके पिता
अंबा शंकर जी ने उनका मन सांसारिक कामों की ओर लगाने के लिए उनका विवाह करने का फैसला कर लिया, परंतु मूल शंकर जी विवाह करने के लिए तैयार नहीं हुए। इस दौरान अपनी छोटी बहन और चाचा जी की
हैजे के कारण मृत्यु होने पर उनका मन और निराश हो गया और सत्य की खोज के लिए उन्होंने घर-बार छोड़ने का निश्चय कर लिया। इस समय उनकी आयु
15 वर्ष की थी।मूल शंकर, 15 वर्ष तक ज्ञान और सच्चे गुरु की खोज में भटकते रहे। अंत में
1860 ईसवी मैं उनको
मथुरा के स्थान पर सत्य गुरु के दर्शन हुए, उनका नाम
स्वामी विरजानंद जी था।
स्वामी विरजानंद जी ने मूल शंकर जी को वेदों के बारे में पूर्ण ज्ञान दिया। ज्ञान प्राप्ति के बाद मूल शंकर ने लोगों को अंधविश्वास से दूर करने के लिए और सत्य ज्ञान का प्रचार करने का निश्चय किया। इस समय मूल्य शंकर,
स्वामी दयानंद सरस्वती जी के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुए।स्वामी दयानंद जी ने भारत के विभिन्न इलाकों में
वेदों का प्रचार किया और लोगों लोगों के अंदर अंधविश्वास की धारणा को दूर किया। स्वामी दयानंद जी की भाषा शैली
जादुई थी। अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने
10 अप्रैल 1875 ईसवी को
मुंबई के स्थान पर
आर्य समाज की स्थापना की। 1875 ईस्वी के जून महीने में, स्वामी दयानंद जी ने अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए एक प्रसिद्ध पुस्तक
सत्यार्थ प्रकाश की रचना की। आर्य समाज ने पूरे भारत में अपार सफलताएं प्राप्त की।
30 अक्टूबर 1833ईस्वी को,
अजमेर के स्थान पर, किसी ने उनको
जहर दे दिया जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गई। इस तरह समस्त संसार के एक महान शख्सियत का अंत हुआ।
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